संदल चादर के जुलूस व ढोल नगाड़े के गूंज के साथ सद्भावना ग्राम तकिया में तीन दिवसीय सालाना उर्स का आगाज…


संदल चादर के जुलूस व ढोल नगाड़े के गूंज के साथ सद्भावना ग्राम तकिया में तीन दिवसीय सालाना उर्स का आगाज…
अंबिकापुर – सरगुजा संभाग मुख्यालय के सद्भावना ग्राम तकिया में बाबा मुराद शाह व बाबा मोहब्बत शाह के मजार स्थल पर हर वर्ष होने वाले संभाग के सबसे बड़े सार्वजनिक उत्सव उर्स का आगाज 20 मई, 2025 मंगलवार को संदल, चादरपोशी के जुलूस व ढोल नगाड़े के गूंज साथ हो गया है।

स्थानीय जामा मस्जिद से जनाब इरफ़ान सिद्दीकी व दानिश रफीक के साथ कमेटी के अन्य ओहदेदारों के नेतृत्व में शाम को निकली जुलूस ने शहर का माहौल एकता और भाईचारा से ओतप्रोत कर दिया। जगह-जगह लोगों ने जुलूस में शामिल लोगों का अभिनंदन किया और चादर की सलामी ली।

हर धर्म और समाज के लोगों ने अपनी-अपनी ओर से चादरपोशी के जुलूस का स्वागत और अभिनंदन किया। देर शाम तकिया पहुंचने के बाद अंजुमन कमेटी के प्रमुखों और मुस्लिम धर्म गुरूओं ने संदल व चादरपोशी की। रात्रि 10 बजे के बाद धार्मिक कार्यक्रम जलसा का आयोजन हुआ !

सरगुजा संभाग मुख्यालय के सद्भावना ग्राम तकिया में हर वर्ष सालाना उर्स का आयोजन किया जाता है। इस बार संभाग के इस बड़े सार्वजनिक उत्सव उर्स का आयोजन 20, 21 व 22 मई को तय किया गया था ! जिसकी शुरूआत आज स्थानीय जामा मस्जिद से निकले भव्य जुलूस के साथ हो गया है।

चादरपोशी के जुलूस में शहर के विभिन्न समुदाय के लोगों ने शिरकत की और आकर्षक बैंड पार्टी ने लोगों को अपने धुन से मंत्रमुग्ध कर दिया। मंगलवार की शाम चादरपोशी के लिए जुलूस निकलने से पूर्व ही तेज आंधी व हल्का बूंदा बांदी पानी के बावजूद उत्साह में कोई कमी नहीं आई। जुलूस शाम लगभग पांच बजे जयस्तंभ चौक स्थित जामा मस्जिद से निकली। रास्ते भर लोगों ने चादर की सलामी ली और नजराना भी भेंट किया। शहरवासियों के साथ विभिन्न समाज और संगठन के लोगों ने जुलूस में शामिल लोगों के लिए चाय-नाश्ते व जलपान की व्यवस्था की और जगह-जगह पुष्पवर्षा कर स्वागत भी किया। एक बार फिर चादरपोशी के लिए निकले जुलूस ने शहर में एकता और भाईचारा की मिसाल कायम की। विभिन्न समाज व संगठनों के द्वारा जगह-जगह चादरपोशी की जुलूस के लिए निकले लोगों को शरबत व मिष्ठान खिलाकर स्वागत किया गया। जुलूस जामा मस्जिद से जयस्तंभ चौक, कदम्मी चौक, सदर रोड, महामाया चौक होते हुए गुरू नानक चौक, पुलिस लाइन, लरंग साय रामानुजगंज नाका (बंगाली चौक) होते हुए तकिया मजार शरीफ पहुंचा। जहां समाज के वरिष्ठजनों व अंजुमन इस्लाहुल मुस्लेमीन कमेटी के पदाधिकारियों ने बाबा मुराद शाह और मोहब्बत शाह के साथ पूरी दुनिया में एकलौती चिड़िया की मजार पर चादरपोशी की। जिस कारण से तकिया को सद्भावना ग्राम कहा जाता है, मजार के ठीक बाजू में स्थित मंदिर में बैगाओं ने एक साथ पूजा-अर्चना की। जहां सभी धर्मों के लोग भी शामिल हुए। तकिया मजार शरीफ में चादर एवं संदल पोशी के बाद रात दस बजे से मिलाद का आयोजन हुआ।

यह कहना कतई गलत नहीं होगा, कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र सरगुजा की पावन भूमि की फिजाएं अलौकिक शक्तियों व पीर फकीरों की आशिर्वाद व दुआए आदिकाल से सराबोर है यही कारण है, कि सरगुजा की पावन धरती में जो भी एक बार आया वह यहीं का हो कर रह गया, फिर वह कभी लौट कर वापस नहीं गया, इसके कई अनेकों उदाहरण है, क्योंकि यह धरती आपको मान सम्मान, धन संपदा, वंश वृद्धि सहित सभी चीजों से नवाजती है !

मानव तो मानव जानवर भी इनके चौखट से खाली नहीं लौटते है, सरगुजा संभाग मुख्यालय अम्बिकापुर से महज चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित वन आश्रित ग्राम तकिया है जो कि मुस्लिम समुदाय का बड़ा मुक्कदश स्थान है यहा पर जिंदा वली हजरत सैय्यद बाबा मुरादशाह व हजरत सैय्यद बाबा मोहब्बत शाह वली र. का मजार शरीफ है आप दोनों भाई है और आप के साथ तोता मुबारक का भी मजार है !

आप को हम बता दें, कि यह एशिया महाद्वीप का एक मात्र ऐसा मजार है, जहाँ पक्षी का मजार है ऐसा बताया जाता है ! पुराने लोगों के बताए अनुसार मरहूम अब्दुल शकूर साहब अम्बिकापुर के जय स्तंभ चौक के पास स्थित जामा मस्जिद के पहले सदर (प्रमुख) थें, इस लिए धार्मिक कार्यक्रमों जिसमें तकिया शरिफ का उर्स मुबारक का आयोजन का जिम्मा भी जामा मस्जिद को ही था और आज भी उर्स का आयोजन जामा मस्जिद प्रबंधन के देखरेख में होता है इस लिए उर्स व मजार के बारे में काफी बातें सुनने को मिला है, वही अक्सर पीर फकीर जो अम्बिकापुर से गुजरते तो उनसे भी कुछ बातें सुनने को मिलता था, कि तकिया के बाबा बड़े दयालु व सबकी सुनने वाले हैं, यहां सच्चे अंतर आत्मा से मांगी गई मुराद जल्द पुरी होती है जो सत्य है, सरगुजा की पावन धारा में आप दोनों भाईयों का कब आना हुआ इसकी सही तारिख किसी को पता नहीं है, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक तकिया का यह मजार लगभग पांच सौ साल से भी ज्यादा पुराना है !


बताया जाता है, कि वर्षों पूर्व आप दोनों भाई सरगुजा के घनघोर जंगल से से गुजर रहे थे तब एक घटना सामने आया जिसमें कुछ अदृश्य काली शक्तियां क्षेत्र के ग्रामीणों को काफी परेशान कर रही थी, जिसके कारण गांव के लोग परेशान थे और वे इससे मुक्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे, ग्रामीणों ने दोनों पीर बाबाओं से इस परेशानी से राहत देने की गुजारिश की अंततः पीर बाबा ने क्षेत्र में डर का पर्याय बने काली शक्तियों से ग्राम वासियों को छुटकारा दिलाया इसके बाद वे जाने लगे तो ग्रामीणों ने उनसे आग्रह किया कि वे यही रहे और उन्हें आशीर्वाद देते रहे ! ग्रामीणों के लगातार आग्रह करने से दोनों बाबा यही रह गए….!

उर्स की शुरुआत…
ग्राम तकिया में उर्स संभवतः देश की आज़ादी से पहले से मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत सरगुजा स्टेट के महाराजाओं के द्वारा प्रारंभ किया गया था, लेकिन तरीका अलग था, मुस्लिम समुदाय के बुजुर्गों की माने तो सरगुजा महाराज पीर बाबा की मजार के पास उर्स के दिन बैठ जाते थे वह भी सादा लिबास में उसके बाद गांव वासियों को भोजन कराते हुए सभी को एक-एक चांदी का सिक्का उपहार स्वरूप देते थे दिन भर चलने वाले कार्यक्रम सूरज ढलने तक समाप्त हो जाता था, क्योंकि सूरज ढलने के बाद ग्राम तकिया के जंगलों में रहने वाले खूंखार जानवर मजार की ओर रुख करते थे इसे देखते हुए सूरज ढलने से पहले ही आम ग्रामीणों को मजार छोड़ देने का आदेश सरगुजा महाराज के द्वारा पहले से दे दिया जाता था, ताकि कोई घटना ना घट सके !

सदभावना ग्राम तकिया…….
ग्राम तकिया को सदभावना ग्राम का दर्जा की भी एक रोचक कहानी है आप कभी मजार शरीफ जाएं तो आपको मजार के ठीक बगल में एक वन देवी का मंदिर भी देखने को मिलेगा यह मंदिर काफी प्राचीन है यहां रखे मूर्तियों के अवशेष आज भी अस्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं यह मंदिर आम मंदिरों की तरह नहीं है यह मंदिर पूर्णता खुली हुई है माना जाता है जनजाति समुदाय के लोगों के द्वारा इसका निर्माण कराया गया था इस मंदिर में भी सरगुजा स्टेट के समय से जनजाति समुदाय के लोगों के द्वारा पूजा अर्चना की जाती है उर्स के समय दोनों ही समुदाय के लोगों का संगम सरगुजा के इस धरती पर होता है इसलिए इसे सद्भावना ग्राम का दर्जा तत्कालीन महाराजाओं के द्वारा दिया गया था !

इस मंदिर में भी सरगुजा स्टेट के समय से जनजाति समुदाय के लोगों के द्वारा पूजा अर्चना की जाती है उर्स के समय दोनों ही समुदाय के लोगों का संगम सरगुजा के इस धरती पर होता है इसलिए इसे सद्भावना ग्राम का दर्जा तत्कालीन महाराजाओं के द्वारा दिया गया था !

हिंदू – मुस्लिम एकता का प्रतीक है उर्स का आयोजन…
आप को यह जानकर हैरत होगा कि पीर बाबाओं के मजार में सदियों से उर्स का आयोजन होता आ रहा है जिसकी शुरुआत सरगुजा स्टेट के हिन्दू महाराजाओं ने शुरू करवाया उस समय यहां शायद ही कोई मुसलमान रहा होगा लेकिन आजादी से ठीक पहले व्यवसाय व सरगुजा महाराज के द्वारा विभिन्न कार्यों के लिए जब लोगों को बुलाया गया तो उसमें मुसलमान समुदाय के लोग भी यहां पहुंचे जो धीरे-धीरे यहीं बस गए ! बाद में उनको ही सरगुजा स्टेट के द्वारा इसकी जिम्मेदारी दे दी गई !

मजार शरीफ़ में जितनी आस्था मुस्लिम समुदाय का है उससे कहीं ज्यादा हिंदू समुदाय का भी आस्था इस मजार से जुड़ा हुआ है यही कारण है, कि उर्स में दोनों समुदाय के लोग मिल-जुलकर यहां उत्सव मनाते हैं और उर्स में मुख्य अतिथि के रूप मे आज भी हिन्दू समुदाय के लोगों को प्राथमिकता दिया जाता है !




