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28 सफ़र पर विशेष : मौला हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के हयाते ज़िन्दगी पर एक नज़र (जीवन परिचय) – मो. इम्तियाज़ अंसारी गढ़वा

28 सफ़र पर विशेष : मौला हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के हयाते ज़िन्दगी पर एक नज़र (जीवन परिचय) – मो. इम्तियाज़ अंसारी गढ़वा

अम्बिकापुर – सफ़र की 28 तारीख़ न केवल पवित्र पैग़म्बर (स) की वफ़ात का दिन है, बल्कि उनके प्रिय नवासे इमाम हसन मुज्तबा (अ) की शहादत का भी दिन है। उनके जीवन और शहादत में समस्त मानवता के लिए बुद्धिमत्ता, शांति और बलिदान का एक गहरा और शाश्वत संदेश निहित है। समय की बारीकियों को समझते हुए, उन्होंने शांति स्थापित करने का जो निर्णय लिया, वह एक झटका लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह उस समय की सबसे बड़ी जीत है।

मो. इम्तियाज़ अंसारी गढ़वा

मौला हजरत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के शहादत को याद करते हुए गढ़वा झलुआ निवासी जनाब इम्तियाज़ अंसारी ने फ़ोन पर लम्बी गुफ्तगू के दौरान मौला हजरत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के शहादत पर रौशनी डालते हुए बताया, कि मौला हजरत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के वालदैन (माता पिता)
मौला हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के वालिद (पिता) हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम तथा आपकी वालिदा (माता) हज़रत मां फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा है। आप अपने वालिदा (माता) वालिद (पिता) की प्रथम नूरे रिसालत के चमन के फूल हैं।

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तारीख व योमे जहुर (जन्म तिथि व जन्म स्थान)
मौला हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम का जन्म (नजु़ल) 1 दिसंबर, 624 ई० तीन ( 3) हिजरी में रमज़ान माह की चौदहवीं (14) तारीख को सऊदी अरब के मदीना शहर में हुआ है। आपकी वफात की तारीख 2 अप्रैल, 670 ई. 28 सफर, 50 हिजरी बताई जाती है। जलालुद्दीन नामक इतिहासकार अपनी किताब तारीख़ुल खुलफ़ा में लिखते है, कि आपकी शक्ल ए अनवार आका व मौला हज़रत पैगम्बर (स.) से बहुत अधिक मिलती है।

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आपकी परवरिश (पालन पोषण)
मौला हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम का पालन पोषन (परवरिश) आपके माता पिता (वालिद- वाल्दा) व आपके नाना रिसालते माब हज़रत पैगम्बर ( स.) और मां फातिमा जहरा सलामुला अलैहा की देख रेख में रहा। मौला हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने मानवता (इंसानियत)के समस्त गुणों को विकसित किया। पहले इमाम हजरत मौला अली अलैहिस्सलाम के शहादत बाद
मौला हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम अपने वालिद मोहतरम के बाद दूसरे इमाम रहे।
जिस वक्त आपने इमामत के फराईज को अंजाम दिया तो चारों और अराजकता फैली हुई थी। दीने मोहम्मदी के खिलाफ खतरनाक मंसूबा पाले इस्लाम के नाम पर साजिश रची जा रही थी। दीने मोहम्मदी को मिटाने के लिए लोगों को लोभ, लालच, खरीद, फोरखत, के साथ-साथ ऐसो इशरत के सामान मुहैया कराए जा रहे थे। आपके वालिद (पिता) की आकस्मिक शहादत इसी साजिश का हिस्सा था। अतः माविया ने जो कि शाम नामक प्रान्त का गवर्नर था इस स्थिति से लाभ उठाकर विद्रोह कर दिया।

मौला इमाम हसन अलैहिस्सलाम के सहयोगियों ने आप के साथ विश्वासघात किया उन्होने धन, दौलत, पद व सुविधाओं के लालच में माविया से साँठ गाँठ करली। इस स्थिति में मौला इमाम हसन अलैहिस्सलाम के सम्मुख दो मार्ग थे एक तो यह कि शत्रु के साथ युद्ध करते हुए दीने मोहम्मदी की हिफाजत करते या दूसरा यह कि वह अपने सच्चे मित्रों व सेना को क़त्ल होने से बचा लें हालात को देखते हुए शत्रु से संधि कर लें। इस अवस्था में मौला इमाम ने अपनी स्थित का सही अंकन किया सरदारों के विश्वासघात व सेन्य शक्ति के अभाव में माविया से संधि करना ही उचित समझा।

संधि की शर्तें
1- माविया को इस शर्त पर सत्ता हस्तान्त्रित की जाती है कि वह दीने मोहम्मदी (कुऑन ) पैगम्बर व उनके नेक उत्तराधिकारियों की सीरत (शैली) के अनुसार कार्य करेगा।

2- माविया के बाद सत्ता मौला इमाम हसन अलैहिस्सलाम की ओर हस्तान्त्रित होगी व इमाम हसन अलैहिस्सलाम के न होने की अवस्था में सत्ता इमाम हुसैन को सौंपी जायेगी। माविया को यह अधिकार नहीं है, कि वह अपने बाद किसी अन्य को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करे।

3- नमाज़े जुमा में मौला इमाम अली पर होने वाला सब (अप शब्द कहना) समाप्त किया जाये। तथा मौला हज़रत अली (अ.) को अच्छाई के साथ याद किया जाये।

4- कूफ़े के धन कोष में मौजूद धन राशी पर माविया का कोई अधिकार न होगा।

5- अल्लाह की पृथ्वी पर मानवता को सुरक्षा प्रदान की जाये चाहे वह शाम में रहते हों या यमन मे हिजाज़ में रहते हों या इराक़ में काले हों या गोरे। माविया को चाहिए कि वह किसी भी व्यक्ति को उस के पिछले व्यवहार के कारण सज़ा न दे। इराक़ वासियों से शत्रुता पूर्ण व्यवहार न करे। मौला हज़रत अली के समस्त सहयोगियों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जाये।

मौला इमाम हसन अलैहिस्सलाम, इमाम हुसैन व पैगम्बर के परिवार के किसी भी सदस्य की खुले आम या छुप कर बुराई न की जाये।

मौला हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के संधि प्रस्ताव ने माविया के चेहरे पर पड़ी नक़ाब को उलट दिया तथा लोगों को उसके असली चेहरे से परिचित कराया कि माविया का वास्तविक चरित्र क्या है।

मो. इम्तियाज़ अंसारी गढ़वा

शहादत (स्वर्गवास)
मौला हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शहादत सन् 50 हिजरी मे सफ़र माह की 28 तरीख को हुई । माविया के षड़यन्त्र स्वरूप आपकी जोजा ईशमा नामक पत्नि ने आपके पीने के पानी मे ज़हर मिला दिया था, यही ज़हर आपकी शहादत का कारण बना।

समाधि
तबक़ाते इब्ने सअद में उल्लेख मिलता है कि मौला इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने अपने जीवन के अन्तिम समय में कहा कि मुझे मेरे नाना के बराबर में दफ्न करना ।

अबुल फरज इसफ़हानी अपनी किताब मक़ातेलुत तालेबीन में उल्लेख करते हैं कि जब इमाम हसन अलैहिस्सलाम को दफ़्न करने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम (स.) को रोज़े पर ले गये तो इसका विरोध किया तथा बनी उमैया व बनी मरवान मौला इमाम हसन अलैहिस्सलाम के दफ़्न में बाधक बने। उनके जनाजे पर तीरों की बरसात की गई।

अन्ततः मौला इमाम हसन अलैहिस्सलाम के ताबूत (अर्थी) को जन्नातुल बक़ी नामक कब्रिस्तान में दफ़्न कर दिया गया।

डॉ. फिरोज अंसारी, गढ़वा

उम्मत की एकता का महान लक्ष्य : इमाम हसन (अ) ने देखा कि अगर वे लड़ेंगे, तो मुस्लिम उम्मत और भी विभाजित हो जाएगी। आंतरिक गृहयुद्ध के कारण हज़ारों निर्दोष लोग मारे जाएँगे और इस्लाम के दुश्मनों को इसका फ़ायदा उठाने का मौक़ा मिलेगा। आपका यह फ़ैसला सिर्फ़ अपनी सत्ता का त्याग नहीं था, बल्कि उम्माह की एकता और अस्तित्व के लिए एक महान बलिदान था। यह कार्य आज भी हमें सिखाता है कि बड़े लक्ष्यों के लिए निजी हितों का त्याग करना ही सच्चा नेतृत्व है।
डॉ. फिरोज अंसारी, गढ़वा (झारखंड)

धैर्य, त्याग और बुद्धि : इमाम हसन की शांति हमें सिखाती है कि कभी-कभी, सही होते हुए भी, हमें बुद्धि और धैर्य का सहारा लेना चाहिए। दिखावटी युद्ध के बजाय, उन्होंने अपने चरित्र और धैर्य से झूठ पर विजय प्राप्त की। उनके इस बलिदान ने इस्लाम की मूल शिक्षाओं को, जो शांति, भाईचारे और सहिष्णुता पर आधारित हैं, सुरक्षित रखा। यह संदेश आज भी हमारे लिए एक प्रकाशस्तंभ है, व्यक्तिगत क्रोध और बदले की भावना से ऊपर उठकर एक बड़े लक्ष्य के लिए बलिदान देने का।
मो. इमरान खान (सोनू) मोमिनपुरा, अम्बिकापुर ज़िला सरगुजा, छत्तीसगढ़ !

मानवता के लिए संदेश : इमाम हसन मुज्तबा (अ) की जीवनी हमें यह भी बताती है कि असली शक्ति तलवार में नहीं, बल्कि चरित्र की दृढ़ता, सिद्धांतों पर अडिगता और उच्च नैतिकता में निहित है। ज़हर दिए जाने के बावजूद, उन्होंने अपने हत्यारे का नाम तक नहीं बताया, ताकि कोई नया राजद्रोह न पनपे। यही क्षमा का वह महान उदाहरण है जो आज भी इंसानों को एक-दूसरे से प्रेम और सहिष्णुता की शिक्षा देता है।
डॉ. वसीम अख्तर, गढ़वा, झारखंड!

मो. वसीम बारी

आज के समय में इमाम हसन (अ) का संदेश : इमाम हसन (अ) का जीवन आज के अशांत समय में हमें शांति, भाईचारा और क्षमा का पाठ पढ़ाता है। हमें अपनी सोच, सामाजिक संबंधों और वैश्विक स्तर पर इन सिद्धांतों को अपनाने की ज़रूरत है ताकि अराजकता और नफ़रत के बजाय एक शांतिपूर्ण और बेहतर दुनिया की स्थापना हो सके। इमाम हसन (अ) का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची सफलता किसी की जान लेने में नहीं, बल्कि दिल जीतने में है।
मो. वसीम बारी, अम्बिकापुर ज़िला सरगुजा (छत्तीसगढ़)

 

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