बच्चों की मौत पर तय हो जिम्मेदारी, ‘जहरीले’ स्वास्थ्य तंत्र का हो उपचार
बच्चों की मौत पर तय हो जिम्मेदारी, ‘जहरीले’ स्वास्थ्य तंत्र का हो उपचार
अम्बिकापुर – लोकप्रिय हिंदी दैनिक समाचार पत्र नई दुनिया में ‘भरोसा डिगाने वाला रवैया’ शीर्षक से प्रकाशित संपादकीय पढ़कर मन अत्यंत व्यथित हुआ। मध्य प्रदेश और राजस्थान में विषाक्त कफ सीरप के सेवन से अब तक 25 से अधिक मासूम बच्चों की मौत होना न केवल दर्दनाक, बल्कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर विफलता का प्रतीक है। यह कोई पहला मामला नहीं है जब नकली या जहरीली दवाइयों ने निर्दोष जानें ली हों और हर बार की तरह इस बार भी जांच और कार्रवाई का ढोल पीटा जा रहा है। दोष केवल उस दवा निर्माता कंपनी का नहीं है जिसने यह घातक सीरप बनाया, बल्कि उन अधिकारियों का भी है जिनकी निगरानी में यह सब हुआ। सरकारें इन अधिकारियों पर करोड़ों रुपये खर्च करती हैं, परंतु जब जिम्मेदारी की घड़ी आती है तो ये या तो मौन रहते हैं या लीपापोती में लग जाते हैं। बिना मिलीभगत के इतनी बड़ी लापरवाही संभव ही नहीं। समय आ गया है कि ऐसे मामलों में सख्त और उदाहरण प्रस्तुत करने वाली कार्रवाई की जाए। दोषियों को बचाने की प्रवृत्ति समाप्त होनी चाहिए !

क्योंकि मानव जीवन में दवाइयों का प्रयोग उपचार के लिए किया जाता है, लेकिन जब दवा ही जहर बन जाए तो पीड़ित का सहारा कौन होगा और स्वस्थ्य रहने के लिए वे कब तक कीमत चुकाते रहेंगे, लेकिन मध्य प्रदेश में 23 और राजस्थान में 4 बच्चों की मौत से साबित हो गया है, वास्तव में स्वास्थ्य विभाग और उससे जुड़ा तंत्र भी कफ सीरप की तरह ही जहरीला होकर सड़ चुका है। पहले स्वास्थ्य तंत्र बीमार था, अब जहरीला हो चुका है, उसे समुचित विष प्रतिरोधक उपचार की आवश्यकता है। देश में आर्थिक रूप से कमजोर बहुतायत ग्रामीण आबादी आज भी सरकारी चिकित्सा केंद्रों और नीम-हकीमों व तथाकथित झोलाछाप की चिकित्सा पर निर्भर है। जहरीले कफ सिरप से होने वाली मौतें धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है लेकिन शासन का ढुलमुल रवैया जारी है। दवा लिखने-वाले चिकित्सक को हिरासत में लेना समस्या का समाधान न होकर दिखावा और ध्यान भटकाने की रणनीति है। शासन को चाहिए, कि इसके लिए जिम्मेदार स्वास्थ्य विभाग और उनकी निगरानी करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को ऐसा दंडित करें कि दूसरे अधिकारी इससे सबक लें।




