
आदिवासी समाज की तरह मुस्लिम समाज को भी UCC से बाहर रखने पर हो गंभीर विचार : रशीद अहमद अंसारी
अम्बिकापुर। छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर मुस्लिम समाज की चिंताओं के बीच जिला कांग्रेस कमेटी अल्पसंख्यक विभाग, सरगुजा-अम्बिकापुर के अध्यक्ष रशीद अहमद अंसारी ने मांग की है कि यदि प्रस्तावित कानून में अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखने का प्रावधान किया जाता है, तो मुस्लिम समाज को भी इससे बाहर रखने के विकल्प पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज की धार्मिक मान्यताओं, शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानूनों और परंपराओं का सम्मान करते हुए संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
रशीद अहमद अंसारी ने कहा कि शरीयत मुस्लिम समाज की धार्मिक आस्था, जीवन-पद्धति और सामाजिक परंपराओं से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। इसलिए समान नागरिक संहिता तैयार करते समय मुस्लिम समाज की भावनाओं और चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस विषय पर कोई भी निर्णय लेने से पहले व्यापक संवैधानिक, कानूनी और सामाजिक विमर्श किया जाए।
धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान जरूरी
अंसारी ने कहा कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों को महत्व देता है। संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने और उसका आचरण करने का अधिकार दिया गया है। हालांकि, यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है।

उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज की धार्मिक मान्यताओं और शरीयत से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों पर विचार करते समय संवैधानिक प्रावधानों, न्यायिक सिद्धांतों और सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। उनका कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और न्याय के बीच संतुलन स्थापित करते हुए ऐसा रास्ता निकाला जाना चाहिए, जिससे किसी समुदाय को अपनी धार्मिक पहचान और परंपराओं को लेकर असुरक्षा महसूस न हो।
शरीयत और देशभक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं
रशीद अहमद अंसारी ने कहा कि मुस्लिम समाज के लिए शरीयत केवल पारिवारिक नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उसकी धार्मिक आस्था और जीवन-मूल्यों से जुड़ी हुई है। इस्लाम इंसानियत, अमन, ईमानदारी, इंसाफ, भाईचारे और जिम्मेदार नागरिकता की शिक्षा देता है।
उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था और देशभक्ति को एक-दूसरे के विरोध में नहीं देखा जाना चाहिए। मुस्लिम समाज भारत की गंगा-जमुनी तहजीब, राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सौहार्द का अभिन्न हिस्सा है। शरीयत के प्रति आस्था और भारतीय संविधान के प्रति सम्मान साथ-साथ कायम रह सकते हैं।
UCC पर व्यापक संवाद की मांग
अंसारी ने प्रस्तावित समान नागरिक संहिता को लेकर अपनी प्रमुख मांगें रखते हुए कहा कि यदि अनुसूचित जनजातियों को UCC से बाहर रखने का प्रावधान प्रस्तावित किया जाता है, तो मुस्लिम समाज को भी इसके दायरे से बाहर रखने के विकल्प पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। साथ ही, शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानूनों और मुस्लिम समाज की धार्मिक मान्यताओं के संरक्षण के लिए उचित कानूनी व्यवस्था पर विचार किया जाए।
उन्होंने मांग की कि UCC का मसौदा सार्वजनिक किया जाए तथा मुस्लिम धर्मगुरुओं, विधि विशेषज्ञों, महिलाओं और सामाजिक प्रतिनिधियों के साथ व्यापक चर्चा की जाए। किसी भी कानून को अंतिम रूप देने से पहले उसके सामाजिक प्रभावों, संवैधानिक पहलुओं और विभिन्न समुदायों पर पड़ने वाले असर का आकलन किया जाना चाहिए।
लोकतांत्रिक तरीके से जारी रहेगी मांग
रशीद अहमद अंसारी ने स्पष्ट किया कि उनका पक्ष समानता, न्याय, महिला सम्मान और संविधान की गरिमा के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि इन उद्देश्यों को प्राप्त करते समय देश की धार्मिक विविधता, विभिन्न समुदायों की मान्यताओं और संवैधानिक मूल्यों का भी सम्मान किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी अनेकता में एकता में निहित है। संविधान की भावना तभी मजबूत होगी, जब सभी समुदायों के नागरिकों को सम्मान, सुरक्षा और अपनी धार्मिक आस्था के अनुरूप जीवन जीने का अवसर मिले।
अंसारी ने कहा कि मुस्लिम समाज की मांगों को लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से उठाया जाता रहेगा। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि मुस्लिम समाज को प्रस्तावित UCC से बाहर रखने के विकल्प पर गंभीरता से विचार किया जाए तथा शरीयत से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों के संबंध में समाज की चिंताओं का संवेदनशीलता से समाधान किया जाए।




