
शरीयत की हिफ़ाज़त और संविधान का एहतराम—UCC से मुस्लिम समाज को बाहर रखने पर हो विचार : मो. इस्लाम एंड रशीद अहमद
अम्बिकापुर। प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर रहनुमा एजुकेशनल सोसाइटी ने मुस्लिम समाज के धार्मिक अधिकारों और शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानूनों के संरक्षण का मुद्दा उठाया है। सोसाइटी के अध्यक्ष मोहम्मद इस्लाम एवं सचिव रशीद अहमद ने मांग की है कि मुस्लिम समाज को UCC के दायरे से बाहर रखने के विकल्प पर गंभीरता से विचार किया जाए तथा इस विषय में समाज के प्रतिनिधियों, धर्मगुरुओं, महिलाओं और विधि विशेषज्ञों से व्यापक संवाद किया जाए।

अध्यक्ष मोहम्मद इस्लाम ने कहा कि “शरीयत हमारी धार्मिक पहचान है और संविधान हमारा गौरव। मुस्लिम समाज की धार्मिक स्वतंत्रता तथा शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानूनों से जुड़ी चिंताओं का सम्मान किया जाना चाहिए।” उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसकी धार्मिक विविधता, सांस्कृतिक विरासत और अनेकता में एकता से है। कानून निर्माण की प्रक्रिया में सभी समुदायों की मान्यताओं और संवैधानिक अधिकारों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि अनुसूचित जनजातियों को उनकी विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान के आधार पर UCC से बाहर रखने का प्रावधान किया जाता है, तो मुस्लिम समाज के व्यक्तिगत कानूनों के संदर्भ में भी इसी तरह के विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए। सोसाइटी का कहना है कि मुस्लिम समाज अपने धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों का पालन करना चाहता है और इस विषय पर उसकी आशंकाओं को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।
धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों पर संवाद की जरूरत
मोहम्मद इस्लाम एवं रशीद अहमद ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 44 राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है। ऐसे में UCC के विषय पर धार्मिक स्वतंत्रता, समानता, महिला अधिकारों और अन्य संवैधानिक प्रावधानों के बीच संतुलन को लेकर व्यापक चर्चा आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि सोसाइटी संविधान का सम्मान करती है और चाहती है कि मुस्लिम समाज की धार्मिक मान्यताओं एवं व्यक्तिगत कानूनों से जुड़ी चिंताओं को भी गंभीरता से सुना जाए। उनका कहना है कि किसी भी प्रस्ताव पर निर्णय लेने से पहले प्रभावित समुदायों को अपनी राय रखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
सोसाइटी ने रखीं छह प्रमुख मांगें
रहनुमा एजुकेशनल सोसाइटी ने मांग की है कि मुस्लिम समाज को UCC से बाहर रखने के विकल्प पर विचार किया जाए, शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े संवैधानिक एवं कानूनी पहलुओं की समीक्षा हो और प्रस्तावित UCC का मसौदा सार्वजनिक कर नागरिकों को अपनी राय रखने का अवसर दिया जाए।
इसके साथ ही मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों, धर्मगुरुओं, महिलाओं, विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों के साथ व्यापक संवाद आयोजित करने तथा धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और महिला सम्मान के बीच संतुलन स्थापित करने की मांग की गई है। सोसाइटी ने यह भी कहा कि किसी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं से जुड़े विषयों पर पर्याप्त विमर्श के बिना एकतरफा निर्णय लेने से बचना चाहिए।
“हमारी मांग किसी के अधिकारों के विरुद्ध नहीं”
सोसाइटी के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि उनकी मांग किसी अन्य धर्म या समुदाय के अधिकारों के विरुद्ध नहीं है। उनका उद्देश्य मुस्लिम समाज की धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े अधिकारों के संरक्षण के लिए लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखना है।
उन्होंने कहा कि इस्लाम इंसाफ, अमन, भाईचारे और इंसानियत की शिक्षा देता है। धार्मिक आस्था, देश के प्रति प्रेम और संविधान के प्रति सम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और सामाजिक सद्भाव को मजबूत बनाए रखना सभी की साझा जिम्मेदारी है।
अंत में मोहम्मद इस्लाम एवं रशीद अहमद ने दोहराया कि सरकार मुस्लिम समाज की चिंताओं को गंभीरता से सुने और UCC से संबंधित सभी पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श सुनिश्चित करे।
सोसाइटी का स्पष्ट संदेश है—“शरीयत हमारी धार्मिक पहचान है, संविधान हमारा गौरव और धार्मिक स्वतंत्रता हमारा अधिकार। संवाद भी चाहिए, सम्मान भी और धार्मिक स्वतंत्रता भी।”
जारीकर्ता: मोहम्मद इस्लाम, अध्यक्ष एवं रशीद अहमद, सचिव, रहनुमा एजुकेशनल सोसाइटी, अम्बिकापुर, जिला सरगुजा, छत्तीसगढ़।




